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एसआईआर में अव्यवस्था की मार: बीएलओ की लापरवाही से आम मतदाता नोटिस के शिकंजे में

एसआईआर में अव्यवस्था की मार: बीएलओ की लापरवाही से आम मतदाता नोटिस के शिकंजे में

 

 रिपोर्ट: ( कृपा शंकर चौधरी, ब्यूरो गोरखपुर)

गोरखपुर/पूर्वांचल
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) के अगले चरण में जहां गलत अथवा अपूर्ण डाटा वाले मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं, वहीं इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक परेशान आम नागरिक हो रहे हैं। प्रशासनिक दावों के उलट, जमीनी हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता नोटिस झेल रहे हैं, जिनकी कोई प्रत्यक्ष गलती नहीं है। उनकी परेशानी की जड़ एसआईआर की शुरुआत के दौरान हुई लापरवाहियां मानी जा रही हैं, जिनमें बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।


दो फार्म, लेकिन प्रक्रिया आधी-अधूरी


एसआईआर अभियान की शुरुआत में बीएलओ द्वारा घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया गया। नियमानुसार इस दौरान दो फार्म भरे जाने थे—एक बीएलओ के रिकॉर्ड के लिए और दूसरा संबंधित मतदाता को देने के लिए। दोनों फार्मों में एक समान और पूर्ण विवरण दर्ज किया जाना अनिवार्य था।
लेकिन स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी और प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों के अनुसार, कई मामलों में बीएलओ ने यह प्रक्रिया पूरी तरह नहीं निभाई। कहीं मतदाताओं को सादा कागज थमा दिया गया, तो कहीं अपूर्ण या अधूरा भरा हुआ फार्म दिया गया। इससे आवेदक के पास अपनी ही एसआईआर से जुड़ी संपूर्ण जानकारी सुरक्षित नहीं रह सकी।


2003 की सूची से मिलान बना सबसे बड़ी चुनौती


गौरतलब है कि एसआईआर के तहत मतदाता डाटा का मिलान वर्ष 2003 की मतदाता सूची से किया जा रहा है। इसके बाद जिन मतदाताओं के नाम 2003 के बाद मतदाता सूची में जुड़े, उनसे यह अपेक्षा की गई कि वे अपने परिजनों के 2003 की सूची के आधार पर विस्तृत विवरण उपलब्ध कराएं।
इन विवरणों में शामिल थे—


संबंधित विधानसभा क्षेत्र
भाग संख्या (पार्ट नंबर)
निर्वाचन क्रमांक
मकान नंबर
2003 की मतदाता सूची में क्रमांक संख्या


समस्या यह हुई कि जिन मतदाताओं को शुरुआत में सही और पूरा फार्म नहीं मिला, वे अपने परिजनों या रिश्तेदारों को यह जानकारी समय पर और सही रूप में उपलब्ध नहीं करा सके। नतीजतन, बड़ी संख्या में फार्म या तो अधूरे भरे गए या उनमें त्रुटियां रह गईं।


नोटिस और निराकरण के बीच पिसता आम मतदाता


अब जब एसआईआर के तहत डाटा मिलान में गड़बड़ी सामने आ रही है, तो प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किए जा रहे हैं। नोटिस मिलने के बाद आम नागरिक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कई मामलों में बुजुर्ग, श्रमिक और ग्रामीण क्षेत्रों के लोग दस्तावेज जुटाने और स्पष्टीकरण देने में भारी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।


स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ विधानसभा क्षेत्रों में नोटिस पाने वालों की संख्या अपेक्षा से कहीं अधिक है, जबकि उनमें से अधिकांश लोग पहले ही सत्यापन प्रक्रिया पूरी कर चुके थे।


देरी की जिम्मेदारी किसकी?


चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं कि एसआईआर जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में प्रत्येक स्तर पर सावधानी और पारदर्शिता जरूरी है। जानकारों का मानना है कि यदि शुरुआती चरण में बीएलओ द्वारा फार्म सही ढंग से भरे जाते और उसकी प्रति विधिवत मतदाता को दी जाती, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती।
इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि एसआईआर कार्य पूरा होने में हो रही देरी और वर्तमान अव्यवस्था के लिए कुछ हद तक बीएलओ की लापरवाही भी जिम्मेदार है।


प्रशासन से अपेक्षा


मतदाता संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि नोटिस की कार्रवाई करते समय यह भी जांच की जाए कि कहीं त्रुटि प्रशासनिक स्तर से तो नहीं हुई। साथ ही, ऐसे मामलों में आम मतदाता को अनावश्यक रूप से परेशान करने के बजाय सरल और मानवीय समाधान निकाला जाए, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों का भरोसा बना रहे।


—  स्रोत: स्थानीय प्रशासनिक रिकॉर्ड, प्रभावित मतदाताओं से बातचीत और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े जानकार

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