अदालत के आदेश बेअसर, विवादों में घिरे प्रधान पर फिर गंभीर आरोप
न्याय के लिए कचहरी-थाने भटक रहे पीड़ित
कृपा शंकर चौधरी ब्यूरो गोरखपुर
गोरखपुर।जनपद गोरखपुर के तहसील सदर अंतर्गत ग्राम प्यासी में एक बार फिर ग्राम प्रधान दिनेश जायसवाल विवादों के घेरे में आ गए हैं। पीड़ित ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रधान राजनीतिक रंजिश के चलते उनके वर्षों पुराने सहन पर जबरन सरकारी निर्माण कराना चाहते हैं, जबकि गांव में अन्य स्थानों पर पर्याप्त सरकारी भूमि उपलब्ध है।
पीड़ित गामा, दुर्गा, लालबचन, दयानंद, मंजू देवी, विनय और विपिन का कहना है कि वे ग्राम पयासी के स्थायी निवासी हैं और उनके पूर्वज बीते लगभग 50 से ज्यादा वर्षों से उक्त भूमि पर मकान बनाकर शांतिपूर्वक निवास करते आ रहे हैं।
वर्तमान में वहां उनका पक्का मकान और सहन विधिवत रूप से कायम है।
मामले की सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है कि इसी भूमि को लेकर वर्ष 1997 में दाखिल वाद संख्या 1499/1997 (हरिलाल आदि बनाम राज्य सरकार) में माननीय सिविल जज (जू.डि.) गोरखपुर ने 17 जुलाई 2000 को स्पष्ट निर्णय पारित करते हुए प्रतिवादियों को स्थायी निषेधाज्ञा के तहत किसी भी प्रकार के निर्माण, ध्वस्तीकरण या हस्तक्षेप से रोका था। यह आदेश आज भी प्रभावी है और इसके विरुद्ध कोई स्थगन आदेश भी नहीं है।
विडंबना यह है कि सभी वैध दस्तावेज और न्यायालय का स्पष्ट आदेश अपने पक्ष में होने के बावजूद पीड़ित न्याय के लिए कचहरी से लेकर थाने तक चक्कर काटने को मजबूर हैं। पीड़ितों का आरोप है कि पुलिस भी न्यायालय द्वारा जारी आदेशों को न तो ठीक से समझ पा रही है और न ही उन्हें जमीन पर लागू करने की पहल कर रही है।
पीड़ितों ने यह भी आरोप लगाया कि ग्राम प्रधान दिनेश जायसवाल का कार्यकाल और पिछला इतिहास भी विवादों से जुड़ा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार विकासखंड स्तर पर विवादित प्रधान के रूप में जाने जाते हैं और उन पर पहले भी मनमाने व नियमविरुद्ध कार्य करने के आरोप लगते रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के उलटे-सीधे कार्य उनके लिए कोई नई बात नहीं हैं।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि तत्काल हस्तक्षेप कर अवैध निर्माण पर रोक लगाई जाए, न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो पीड़ितों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।
अब बड़ा सवाल यह है कि—
क्या न्यायालय के आदेश केवल फाइलों तक सीमित रह गए हैं?
क्या प्रभावशाली ग्राम प्रधानों के सामने कानून बेबस हो चुका है?
या फिर प्रशासन आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आएगा?